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हमारे इर्द-गिर्द लाखों घटनाएँ रोज घटती हैं और अगर हम उनको किसी के साथ न बांटें तो ये हमारे अंदर घुटन पैदा करती हैं ,आज मैनें यह सोचा की
क्यों न अपने अंदर पैदा होने बाली इस घुटन को
बाहर निकालूं और कुछ लिखूं ताकि आने बाला कल ये जान सके की सच क्या है ................
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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

जिन्दगी की राहों पर

लहरों पर दौड़ने के लिए हिमत का होना जरूरी होता है 
          आसमान में उड़ने के लिए होसलों का होना जरूरी होता है
 जिन्दगी युहीं नहीं जी जाती साथिया, 
             जीने के लिए इच्छाओं का जिन्दा रहना  जरूरी होता है
 यूँ तो जिन्दगी छोटे छोटे धागों से मिलकर बनती है
               पर हर धागे को पक्का रखने के लिए 
 सच्चा प्यार होना जरूरी होता है 
          खुशियाँ  यूँ ही नहीं आती है जिन्दगी में किसी की  ,
खुशियाँ लाने के लिए खुश रहना जरूरी होता है 
           जिन्दगी की राहों  पर डगमगा न जाये कदम  कहीं
 इसलिए हर कदम को सोच समझ कर रखना जरूरी होता है
 जंग युहीं नहीं जीती जाती बातें करके वीर  ,
         जंग जितने के लिए लड़ना जरूरी होता  है 
 

                                                           प्रदीप सिंह    (एच. पी . यू ) शिमला
     








शनिवार, 18 सितंबर 2010

हाँ मैं कामरेड हूँ यह सचाई है ..................................

रोशन करे जो सबके घरों को ऐसी मशाल हमने जलाई है ,
ठोकर मारी है हमने उस शीशे के महल को ,झोंपड़ी हमने उस बस्ती में बनाई है ,
              दुश्मन समझते हैं हमको हमारे चाहने बाले ,वो नहीं जानते की हम मोम हैं ,
              यूँ तो जीते हैं सब अपने लिए ,जो दूसरों के लिए जिए वो ही तो कामरेड है ,
यूँ तो मिल जायेंगे जखम पर मरहम लगाने बाले बहुत ,
पर जो दिल पर मरहम लगाये वो दोस्त कहाँ मिलता है,
           सालों हो गए हमे आज़ाद हुए पर आज़ाद कहाँ मिलता है
 इस शब्द पर न जाना , इस में तो दुनिया समाई है ,
            जिसमे न कोई जाति है , न कोई धर्म है ,
                                        बस एक इंसानों की दुनिया बसाई है ,
                      हाँ में एक कामरेड हूँ यह एक  सचाई है .......................................
                                                                               प्रदीप सिंह (एच . पी. यू. )

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

खुशहाली कहाँ से लाओगे........................................

भले मकां तुम पत्थर से चुनबा लो ,रिश्तों को जो पक्का करे वो सीमेंट कहाँ से लाओगे,
खरीद सकते हो तुम धन दौलत से ख़ुशी भले ही , मगर क्या खुशहाली खरीद पाओगे ,
              लगा लो कारखाने चाहे कितने ही तुम अपने आंगन में, पर मशीन जो चलाये वो हाथ कहाँ से लाओगे ,
              खरीद सकते हो तुम धन दौलत से ख़ुशी भले ही , मगर क्या खुशहाली खरीद पाओगे ,
बना लो चाहे तालाब, लगा लो नल कितने ही घर में , मगर सूख गए अगर नदी नाले और दरिया तो पानी कहाँ से लाओगे ,
 खरीद सकते हो तुम धन दौलत से ख़ुशी भले ही , मगर क्या खुशहाली खरीद पाओगे ,
                       लगा लो घर में फूल कागज़ के कितने ही चाहे , लेकिन वो सुगंध , वो भंब्रे कहाँ से लाओगे,
                     खरीद सकते हो तुम धन दौलत से ख़ुशी भले ही , मगर क्या खुशहाली खरीद पाओगे ,
हंसो चाहे कितना ही तुम खेतों को उजाड़ कर हमारे , जब न रहेंगे खेत तो अनाज कहाँ से लाओगे.
खरीद सकते हो तुम धन दौलत से ख़ुशी भले ही , मगर क्या खुशहाली खरीद पाओगे....................

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

देश क्या आज़ाद है ..............................

गुलाम आज भी हूँ पर शारीर पर बेड़ियाँ नहीं ,
रिश्ते आज भी हैं पर वो नजदीकियां नहीं ,
किताबें आज भी पढाई जाती हैं बचों को,
पर उसमें हमारी कहानियां नहीं ,
लड़े थे वो भी देश के लिए , लड़े थे हम भी देश के लिए ,
पर इतिहास मैं वो अब भी जिन्दा हैं पर हमारी निशानियाँ नहीं,
आजाद तुम हो हम नहीं ,लड़ाई अब भी जरी है पर सिपाही तुम नहीं,
चूमा था फांसी के फंदे को यह समझ कर की जिन्दगी अब शुरू हुई ,
लेकिन कौन जानता था यह जिन्दगी -जिन्दगी नहीं,
आज एक बार फिर लाल किले पर तिरंगा फेहराया जायेगा ,
की थी गुलामी अंग्रेजों की इसलिए याद किया जायेगा ,
यह कहकर की हम आजाद हैं पूरा वर्ष खून बहाया जायेगा ,
कहीं पर दंगे , कहीं पर बिस्फोट करके राजनीती को चमकाया जायेगा,
फिर औरत विधवा होगी ,फिर किसी माँ का वेटा खो जायेगा,
और फिर भी बड़े गर्व से "भारत माँ की जय " का नारा लगाया जायेगा,
---------------------------पर मैं आज भी यही कहूँगा : "गुलाम आज भी हूँ पर शारीर पर बेड़ियाँ नहीं ,
रिश्ते आज भी हैं पर वो नजदीकियां नहीं "-----------------------------"अपने आप को पहचानिए और अपने दिल पर हाथ रखकर कहिए देश क्या आजाद है

शनिवार, 4 सितंबर 2010

हर मौसम का अपना मिज़ाज होता है

हर मौसम का अपना मिज़ाज होता है हर चेहरे के पीछे एक राज होता है,
तुम क्यों बेठे हो चेहरा दुपते से छुपाए आखिर चाँद मैं भी तो दाग होता,
बाग़ मैं खिलते हैं अनेकों फूल ,पर उनमें से एक फूल लाजबाब होता है,
यूँ तो मंडराते हैं भंवरे फूलों पर कई , पर मर मिटे अपनी चाहत के लिए ऐसा लाखों मैं एक होता है,
हर मौसम का अपना मिजाज़ होता है , हर ख़ुशी पर चेहरे का रंग कुछ खास होता है
हो भले ही शरीर से आदमी कितना ही बुडा पर होंसलों मैं जवानी का जोश होता है ,
हर मौसम का अपना ही मिजाज़ होता है --------------------

ज़िन्दगी इक संघर्ष

लगाकर आग खुद वो घर को , आग बुझाने का बहाना करने लगे , लगाकर कारखाने गुलिस्तान में, फूल कागज़ के आँगन में उगाने लगे , बह गए वो घर वो मकान, अब हर सहर ,हर गली वेगाने लगने लगे , पहले खुद ही दिए ज़ख़्म हज़ार हमको , अब उनमें मरहम लगाने लगे , तुम यह न सोचना की हम अकेले रहेंगे , हमारे बाद तो हमारी चिताओं पैर मैले लगेंगे , अगर इतना ही आसान होता किसी को भूल जाना ,तो सब भूल जाते ,फिर हमे भूलने के लिए तो तुम्हें जमाने लगेंगे