काश में तेरे चेहरे के पीछे छीपे दर्द को समझ पाता, तो शायद कुछ और होता
तेरे पत्थर पर तराशे उन सपनों को देख पाता, तो शायद कुछ और होता,
समझ पाता तेरी खामोश नज़रों कि बेचैनी को तो शायद कुछ और होता,
तेरे सफेद चादर से लिपटे खामोश बदन के सच को समझ पाता तो शायद कुछ और होता,
समझ पाता आसमान में उठते धुंए का मतलब तो शायद कुछ और होता,
मिल जाता तेरी यादों का ही सहारा जीने के लिए तो शायद कुछ और होता,
काश मिल जाता बचपन का साथी मुझे दोबारा तो शायद कुछ और होता ..........
प्रदीप सिंह
गांव –औच ,डाकघर –लाह्डू, तहसील – जयसिंह पुर, जिला – काँगड़ा , हिमाचल प्रदेश : 8894155669
Email: rana.pradeep83@gmail.com
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