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मारे इर्द-गिर्द लाखों घटनाएँ रोज घटती हैं और अगर हम उनको किसी के साथ न बांटें तो ये हमारे अंदर घुटन पैदा करती हैं ,आज मैनें यह सोचा की
क्यों न अपने अंदर पैदा होने बाली इस घुटन को
बाहर निकालूं और कुछ लिखूं ताकि आने बाला कल ये जान सके की सच क्या है ................

शनिवार, 2 मई 2015

काश मिल जाता बचपन का साथी मुझे दोबारा तो शायद कुछ और होता ..........

काश में तेरे चेहरे के पीछे छीपे दर्द को समझ पाता, तो शायद कुछ और होता
तेरे पत्थर पर तराशे  उन सपनों को देख पाता, तो शायद कुछ और होता,

समझ पाता तेरी खामोश नज़रों कि बेचैनी  को तो शायद कुछ और होता,
 तेरे  सफेद चादर से लिपटे खामोश बदन के सच को समझ पाता तो शायद कुछ और होता,

समझ पाता आसमान में उठते धुंए का मतलब तो शायद कुछ और होता,
मिल जाता तेरी यादों का ही सहारा जीने के लिए तो शायद कुछ और होता,

काश मिल जाता बचपन का साथी मुझे दोबारा तो शायद कुछ और होता ..........
प्रदीप सिंह

गांव –औच ,डाकघर –लाह्डू, तहसील – जयसिंह पुर, जिला – काँगड़ा , हिमाचल प्रदेश : 8894155669
Email: rana.pradeep83@gmail.com

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