खुदा भी अजीब मजाक कर रहा है ,
बनाकर बर्फ की ऊँची इमारतें ,
खुद ही उन्हें गिरा रहा है ,
जख्मों का कोई हिसाब नहीं,
खामोश चेहरों में अब जान नहीं,
एक अलग सा रंग हो गया है मिटटी का भी अब तो,
शमशान सा हो गया है शहर मेरा भी अब तो,
भटक रहे है लोग अपनों की तलाश में,
हर चेहरे की मिटटी को बार- बार बदल रहे हैं,
दर्द से लिपटे रिश्ते चीख-चीख कर पूछ रहे हैं,
क्या गुनाह किया था खुदा से ये सवाल कर रहे हैं,
प्रदीप सिंह
गांव –औच ,डाकघर –लाह्डू, तहसील – जयसिंह पुर, जिला – काँगड़ा , हिमाचल प्रदेश : 8894155669
Email: rana.pradeep83@gmail.com
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